देश को फ़ासीवादी नहीं गांधीवादी विचार चाहिए: राम लाल ठाकुर

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अनवर हुसैन…

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य, पूर्व में कई बड़े विभागों के मंत्री रहे व विधायक श्री नयना देवी जी ने देश व प्रदेश में चल रही भाजपा सरकारों पर वैचारिक हमला करते हुए कहा कि देश और प्रदेश फासीवादी तरीके से नहीं सिर्फ गांधीवादी विचारधारा और विचारकों से ही चल सकता है। उन्होंने कहा कि आर टी आई कार्यकर्ता शाहेला मसूद, लेखक एम एम कलबुर्गी, वरिष्ठ कन्नड़ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या और अब स्टेन स्वामी की मौत ने फिर साबित किया भारत में न कोई मानवाधिकार है और न ही कोई न्याय व्यवस्था रह गई है। ऐसे में इस देश को सिर्फ गांधीवादी विचार और विचारक ही चला सकते है न कि कोई फासीवादी ताकतें। उन्होंने कहा कि आजादी से लेकर अब तक यह देश संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर खरा उतरते हुए बड़े बड़े आयाम तय करता आया हैं लेकिन सबका धर्म संविधान, सद्भावना और सहिष्णुता ही था। आ‍दिवासी और वंचितों के अधिकार के लिए मुखर रहने वाले स्‍टेन स्‍वामी का बीते सोमवार को निधन हो गया। स्‍टेन स्‍वामी की जमानत याचिका पर बीते सोमवार को ही सुनवाई होनी थी, लेकिन उनका निधन हो गया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जी खेद और दुख भी प्रकट किया है और अन्य विपक्ष के नेताओं ने केंद्र पर निशाना साधते हुए बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी को राष्‍ट्रीय अपमान और उनकी मौत को हत्या तक बताया है विषय जांच का है। 84 वर्षीय स्टैनिस्लॉस लोर्दूस्वामी उर्फ फादर स्टेन स्वामी में हमेशा अपना जीवन आदिवासी, दलित समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में समर्पित रहा और उनके अधिकारों को लेकर हमेशा से ही संघर्षरत रहे थे। एनआरसी और दिल्‍ली दंगों के मामले में भी मानवाधिकार हनन और उत्पीड़न स्पष्ट तौर पर देखा गया है। अब तो यह एक प्रथा ही बना दी गई है कि सरकार और सत्तारूढ़ दल से असहमति के कारण किसी भी व्यक्ति को बिना किसी सबूत के देशद्रोह के काले कानून के अंतर्गत जेल भेज दिया जाए। लेकिन इतिहास गवाह है कि शताब्दियों से मानव, सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए निरंतर भटकता रहा है और इसी कारण दुनिया में कई युद्ध, क्रांति, बगावत, विद्रोह, हुए हैं जिसके कारण अनेक बार सत्ताओं में परिवर्तन हुए हैं। अगर भारत के संदर्भ में बात की जाये तो हमें यह पता है कि हमारा भारतीय समाज आरंभ में वर्ण व्यवस्था पर आधारित था और धीरे -धीरे वह जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गया। असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, रूढ़िवादिता समाज में पूरी तरह व्याप्त थी। यह सामंती दौर था जहां गरीब, दलित, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों के प्रति अनादर भाव था। वे समानता के अधिकारी नहीं थे। उन्हें न्याय नहीं मिलता था। लेकिन देश को मिलने वाले संविधान व गांधीवादी विचारधारा ने आज के समाज को बदला है, उन्होंने कहा कि जो समाज मे मानवीय मूल्यों को लेकर बदलाव होने थे वह एक ट्रांजिशन फेस में थे लेकिन जून 2014 के बाद उन पर पूर्ण विराम लग चुका है। उन्होंने कहा कि वह खुद पेशे से वकील लेकिन हमारी
अदालतों में विचाराधीन मुकदमों को देखा जाये जो अनुमानतः कोई तीन करोड़ की संख्या है उसका निपटारा कब तक हो पायेगा कह पाना मुश्किल है। मुकदमों का यह पिरामिड देशवासियों के लिए चिंता और भय का कारण है। कुछ फास्ट ट्रैक कोर्ट बने हैं लेकिन स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं हो पाया। वर्ष जून 2014 के बाद वादे किए गए कि कानून और लंबित मामलों का रूप बदला जाएगा लेकीन स्थिति और भयाभय कर दी गई। तो ऐसे में क्या एम एम कलबुर्गी, गौरी लंकेश, शीहेला मसूद और स्टेन स्वामी को क्या न्याय मिल पाएगा? तो ऐसे में जिस तर्ज पर फ़ासीवादी ताकतें काम कर रही है उनको समझना होगा कि यह देश सिर्फ गांधीवादी विचार को लेकर आगे बढ़ा है और बढ़ेगा भी।

 

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